रमेश किसान
दो-तीन साल पहले रमेश ने पहली बार सुना — "फोन में एक ऐप है जिससे कुछ भी पूछ सकते हो, हिंदी में बोलो तो जवाब देता है।" उसे विश्वास नहीं हुआ — "भला मशीन कैसे समझेगी मेरी बात?" पर जब बेटे ने माइक दबाकर पूछा "टमाटर के पत्ते पीले क्यों हो रहे" — जवाब दस सेकंड में आ गया।
यह था एआई का पहला दौर — सवाल-जवाब का ज़माना। तुम पूछो, एआई जवाब दे। बस इतना। न कोई जटिल तरीका, न लंबा निर्देश — सीधा सवाल, सीधा जवाब। जैसे किसी जानकार से फोन पर पूछना।
पहला दौर — सवाल-जवाब का ज़माना
सन् दो हज़ार बाईस से दो हज़ार चौबीस तक — दुनिया ने पाया कि मशीन से सामान्य भाषा में बात हो सकती है। पहले यंत्र (कंप्यूटर) से बात करने के लिए विशेष भाषा चाहिए होती थी — अब बस बोलो या लिखो, वो समझता है। यह बहुत बड़ा बदलाव था — पहली बार गाँव का इंसान भी यंत्र से अपनी भाषा में बात कर सकता था।
दूरभाष से तुलना
जैसे दूरभाष (टेलीफोन) आया तो लोगों को विश्वास नहीं हुआ — "तार से आवाज़ कैसे जाएगी?" एआई भी वैसा ही क्षण था — "मशीन मेरी बात कैसे समझेगी?"
दो हज़ार बाईस में चैटजीपीटी आया — पाँच दिन में दस लाख लोगों ने इस्तेमाल किया। इतिहास में सबसे तेज़ बढ़ने वाला औज़ार!
पहले बनाम अब
| पहले | सवाल-जवाब दौर |
|---|---|
| शहर जाओ, पूछो | फोन में पूछो |
| एक दिन लगे | दस सेकंड |
| पैसे लगें | मुफ्त या बहुत सस्ता |