सुनीता दुकानदार
सुनीता एआई से सवाल पूछती थी — "छूट कैसे दूँ?" पर एआई को उसकी दुकान, ग्राहक, सामान कुछ नहीं पता। इसलिए जवाब सामान्य आता — "बीस प्रतिशत छूट दो।" पर सुनीता की दुकान में कुछ सामान पर छूट देने से नुकसान होता! एआई को दुकान की असल बात नहीं पता थी।
दूसरा दौर — एआई को अपनी जानकारी दो। सुनीता ने बताया: "मेरी किराना दुकान है, बीस तरह का सामान, आटा-दाल पर मुनाफ़ा पाँच प्रतिशत, बिस्कुट पर बीस प्रतिशत।" अब एआई ने कहा: "बिस्कुट पर दस प्रतिशत छूट दो — नुकसान नहीं होगा, ग्राहक बढ़ेंगे।" — यह है जानकारी की ताकत!
दूसरा दौर — जानकारी का ज़माना
पहले दौर में एआई सबको एक जैसा जवाब देता था। दूसरे दौर में — एआई को तुम्हारी जानकारी दो (दुकान का हिसाब, खेत की जानकारी, परिवार की ज़रूरतें) तो वो "तुम्हारा" जानकार बन जाता है। जैसे नया वकील सबको सामान्य सलाह देता है — पर जब तुम्हारा मुकदमा पढ़ ले तो "तुम्हारी" सही सलाह देता है।
पुराना वकील बनाम नया
नया वकील: "शिकायत दर्ज करो।" पुराना वकील जो तुम्हारा इतिहास जानता है: "तुम्हारे मामले में धारा इतनी लगेगी, पहले यह कागज़ तैयार करो।" एआई को जानकारी दो = पुराना वकील।
बड़ी कंपनियाँ एआई को अपने सारे कागज़ात देती हैं — फिर एआई उनका "अंदरूनी जानकार" बन जाता है। तुम भी अपनी दुकान/खेत की जानकारी देकर यही कर सकते हो।
बिना जानकारी बनाम जानकारी के साथ
| सामान्य सवाल | जानकारी के साथ सवाल |
|---|---|
| सामान्य जवाब | तुम्हारे लिए जवाब |
| सबको एक जैसा | सिर्फ तुम्हारे हिसाब से |
| "छूट दो" | "बिस्कुट पर दस प्रतिशत — नुकसान नहीं" |